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अनुभव सिन्हा: “लोगों के बीच घुलना-मिलना ही मेरा असली काम है, जिनके लिए मैं फिल्में बनाता हूँ”
अनुभव सिन्हा: “लोगों के बीच घुलना-मिलना ही मेरा असली काम है, जिनके लिए मैं फिल्में बनाता हूँ”
भारतीय फिल्म उद्योग में जब भी सामाजिक और संवेदनशील मुद्दों पर बनी फिल्मों की बात होती है, तो निर्देशक अनुभव सिन्हा (Anubhav Sinha) का नाम सबसे पहले आता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक व्यावसायिक निर्देशक के रूप में की थी, लेकिन बाद में उन्होंने सिनेमा को समाज के आईने की तरह इस्तेमाल किया। उनके लिए सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की सच्चाइयों को दिखाने और उन पर सवाल उठाने का एक शक्तिशाली माध्यम है। हाल ही में अनुभव सिन्हा ने कहा, “The task is to mix with people in the streets — those I make my films for.” यानी, मेरा असली काम है उन लोगों के बीच घुलना-मिलना, जिनके लिए मैं फिल्में बनाता हूँ। यह कथन उनके सोच, उनके नजरिए और उनके सिनेमा की आत्मा को बखूबी दर्शाता है।
🎬 शुरुआत और बदलाव की कहानी
अनुभव सिन्हा ने अपने करियर की शुरुआत टीवी सीरियल्स और म्यूज़िक वीडियोज़ से की थी। शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ व्यावसायिक फिल्में बनाईं जैसे ‘Tum Bin’ (2001), जो एक रोमांटिक म्यूज़िक हिट रही। इसके बाद उन्होंने ‘Dus’, ‘Cash’, ‘Ra.One’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया, जो बड़े बजट और ग्लैमर से भरी थीं। लेकिन इन फिल्मों के बाद अनुभव सिन्हा ने खुद से एक बड़ा सवाल पूछा — “क्या मैं वही फिल्में बना रहा हूँ जो मुझे बनानी चाहिए?”
यहीं से उनके अंदर एक बदलाव आया। उन्होंने महसूस किया कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह समाज से संवाद करने का माध्यम है। यही सोच उन्हें ‘Mulk’, ‘Article 15’, ‘Thappad’, ‘Anek’, ‘Bheed’ जैसी फिल्मों की ओर लेकर गई — ऐसी फिल्में जो समाज के गहरे मुद्दों पर चोट करती हैं।
🧠 “लोगों के बीच रहना ही असली सीख है”
अनुभव सिन्हा का कहना है कि जब तक एक फिल्ममेकर आम लोगों के बीच नहीं जाएगा, तब तक वह समाज की असलियत को समझ नहीं सकता। उनके अनुसार, “मैं जिनके लिए फिल्में बनाता हूँ, वे लोग सड़कों पर हैं, गांवों में हैं, बसों में सफर करते हैं, मजदूरी करते हैं, नौकरी ढूंढते हैं। अगर मैं उनसे दूर रहूँगा, तो उनकी सच्चाई कैसे समझ पाऊँगा?”
उनका यह नजरिया इस बात को दर्शाता है कि वे अपने दर्शकों से एक गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। यही कारण है कि उनकी फिल्मों में सच्चाई, दर्द और सवाल — तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। वे सिर्फ कहानी नहीं बताते, बल्कि समाज से संवाद करते हैं।
🎥 सामाजिक सिनेमा की नई परिभाषा
जब ‘मुल्क’ (2018) रिलीज़ हुई, तो लोगों ने अनुभव सिन्हा को एक नए नजरिए से देखा। यह फिल्म भारत में धर्म और पहचान की जटिलताओं पर थी। इसमें यह दिखाया गया कि कैसे एक व्यक्ति के धर्म के कारण पूरे परिवार को शक की नजर से देखा जाता है। फिल्म ने समाज को झकझोर दिया और एक खुली बहस छेड़ दी।
इसके बाद आई ‘Article 15’, जिसने जातिवाद और भेदभाव की जड़ों को उजागर किया। यह फिल्म न केवल एक कहानी थी बल्कि एक सवाल थी — “हम बराबरी की बात करते हैं, लेकिन क्या सच में सब बराबर हैं?”
फिर आई ‘Thappad’, जिसने पितृसत्ता पर चोट की और पूछा — “क्या सिर्फ एक थप्पड़ इतना छोटा मुद्दा है कि उसे अनदेखा कर दिया जाए?” इस फिल्म ने लाखों महिलाओं को अपने हक और आत्मसम्मान के लिए सोचने पर मजबूर किया।
उनकी फिल्म ‘Bheed’ (2023) ने कोविड लॉकडाउन के दौरान हुए प्रवासी मजदूरों के संघर्ष को दिखाया। यह फिल्म सच्चाई के इतने करीब थी कि लोगों के दिलों को छू गई।
🌍 आम लोगों की कहानी — असली भारत की झलक
अनुभव सिन्हा का मानना है कि सिनेमा तभी प्रभावशाली बन सकता है, जब उसमें आम लोगों की जिंदगी झलके। उनके अनुसार, फिल्में सिर्फ चमक-दमक के लिए नहीं होतीं। वे कहते हैं,
“अगर आप देश के गांव, कस्बे और गली-मोहल्लों को नहीं समझते, तो आप भारत को नहीं समझते।”
इसीलिए वे शूटिंग से पहले रिसर्च करते हैं, लोगों से बात करते हैं, उनके हालात को समझते हैं। उनकी फिल्मों के किरदार गढ़े हुए नहीं, बल्कि जीते-जागते लोग लगते हैं।
💬 सिनेमा से समाज तक – बदलाव की कोशिश
अनुभव सिन्हा का उद्देश्य सिर्फ फिल्म बनाना नहीं, बल्कि चर्चा शुरू करना है। वे मानते हैं कि समाज तब बदलता है जब लोग सवाल पूछना शुरू करते हैं। उनकी फिल्मों में हमेशा एक सवाल छिपा होता है, जो दर्शकों के मन में देर तक गूंजता रहता है।
‘थप्पड़’ देखने के बाद कई महिलाओं ने कहा कि वे अब चुप नहीं रहेंगी। ‘Article 15’ ने युवाओं में सामाजिक न्याय की भावना जगाई। ‘मुल्क’ ने लोगों को सोचने पर मजबूर किया कि “क्या हम सच में सहिष्णु हैं?”
यही सिनेमा का असली असर है — जब वह पर्दे से निकलकर लोगों की सोच में उतर जाए।
🎭 अनुभव सिन्हा – एक संवेदनशील कहानीकार
सिन्हा की खासियत यह है कि वे किसी भी मुद्दे को बिना डर के सामने रखते हैं। वे न तो प्रचार करते हैं, न उपदेश देते हैं। उनकी कहानी में एक इंसान की सच्ची भावनाएँ होती हैं। वे कहते हैं,
“मैं फिल्म नहीं बनाता, मैं उन सवालों को आवाज़ देता हूँ जो हमारे समाज में दबे हुए हैं।”
वे अपने काम में सच्चाई और संवेदना दोनों को साथ लेकर चलते हैं। यही वजह है कि उनके सिनेमा को “Real Cinema” कहा जाता है — जो दिल से बनता है और दिल तक पहुँचता है।
💡 निष्कर्ष: सड़कों से उठी कहानियाँ, समाज तक पहुँचा संदेश
अनुभव सिन्हा का यह कथन — “The task is to mix with people in the streets, those I make my films for” — सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक दर्शन है। यह बताता है कि एक सच्चा कलाकार वही है जो अपने दर्शकों की धड़कनों को समझे, उनके बीच रहे, उनकी भावनाओं को महसूस करे और फिर उन्हें सिनेमा के माध्यम से व्यक्त करे।
उनकी फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि अगर सिनेमा सच्चाई से जुड़ा हो, तो वह समाज को बदलने की ताकत रखता है।
अनुभव सिन्हा आज सिर्फ एक निर्देशक नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कहानीकार और सामाजिक विचारक बन चुके हैं। वे हर बार अपने दर्शकों को यह याद दिलाते हैं कि सिनेमा का असली मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि इंसानियत की आवाज़ बनना है।
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