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आज़ादी से ‘जंगलराज’ तक: बिहार में लोकतंत्र का सफर और 'फुटानीबाज़ों' का उदय
आज़ादी से ‘जंगलराज’ तक: बिहार में लोकतंत्र का सफर और 'फुटानीबाज़ों' का उदय
पटना: भारत की आज़ादी के बाद बिहार को देश के सबसे शिक्षित, जागरूक और राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्यों में गिना जाता था। नालंदा और विक्रमशिला जैसी प्राचीन विश्वविद्यालयों की धरती पर जब लोकतंत्र की शुरुआत हुई, तब उम्मीद थी कि बिहार देश के विकास की राह दिखाएगा।
लेकिन बीते 75 वर्षों का सफर कुछ और ही कहानी कहता है — एक ऐसी कहानी जिसमें लोकतंत्र ने कई रंग देखे, सत्ता ने कई चेहरे बदले, और आम जनता के बीच ‘फुटानीबाज़ी’ जैसी संस्कृति ने गहरी जड़ें जमा लीं।
आजादी के बाद उम्मीदों की सुबह
1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तब बिहार ने भी नई उम्मीदों के साथ अपने कदम बढ़ाए। पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, समाजसेवी जयप्रकाश नारायण और मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह जैसे नेताओं ने बिहार को नई दिशा दी।
उन दिनों राजनीति सेवा का माध्यम थी, और जनता से जुड़ाव नेताओं की पहचान।
लेकिन जैसे-जैसे दशकों का सफर आगे बढ़ा, बिहार की राजनीति में जातिवाद, धनबल और बाहुबल का असर गहराने लगा। जनता और जनप्रतिनिधि के बीच की दूरी बढ़ती गई, और लोकतंत्र का स्वरूप धीरे-धीरे बदलने लगा।
जेपी आंदोलन: बदलाव की बुनियाद
1970 के दशक में जब देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ उठी, तो बिहार उस आंदोलन का केंद्र बना।
जयप्रकाश नारायण का “संपूर्ण क्रांति आंदोलन” न केवल इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती देने वाला आंदोलन था, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नई पीढ़ी के नेताओं को जन्म देने वाला दौर भी था।
इसी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे चेहरे आगे चलकर राज्य की राजनीति पर छा गए।
जेपी ने कहा था — “सत्ता जनता की होनी चाहिए, किसी व्यक्ति या वर्ग की नहीं।”
लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि जिस आंदोलन से लोकतंत्र को मज़बूती मिलनी थी, उसी से राजनीति में जातीय समीकरणों का नया खेल शुरू हो गया।
लालू युग: सामाजिक न्याय बनाम कानून व्यवस्था
1990 का दशक बिहार की राजनीति में टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। लालू प्रसाद यादव ने सत्ता संभाली और नारा दिया — “भूरा बाल साफ करो” यानी ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और लाला का वर्चस्व खत्म करो।
इस नारे के ज़रिए उन्होंने पिछड़े और दलित वर्ग को एकजुट किया और उन्हें राजनीतिक ताकत दी।
लालू यादव का कहना था — “हमने गरीब को हक़ दिया, जो पहले हाशिए पर था।”
निस्संदेह, उनके दौर में सामाजिक न्याय की आवाज़ बुलंद हुई, लेकिन कानून व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई।
अपहरण, रंगदारी, हत्या और लूट जैसे अपराधों ने बिहार को ‘जंगलराज’ के नाम से कुख्यात कर दिया।
लोग दिन के उजाले में डरने लगे, व्यापार ठप पड़ गया, और स्कूल-कॉलेजों की हालत बद से बदतर होती चली गई।
फुटानीबाज़ी’ की शुरुआत: जब अपराध राजनीति से मिला
लालू शासन के दौरान एक नया शब्द आम ज़ुबान में आया — “फुटानी।”
‘फुटानीबाज़’ यानी वो स्थानीय दबंग जो अपने इलाके में खुद को कानून से ऊपर समझता था।
ऐसे लोग गाँवों और कस्बों में नेताओं के करीबी बनकर राज करते थे।
किसी की ज़मीन कब्जा करनी हो, चुनाव में किसी को डराना हो या टेंडर हथियाना — फुटानीबाज़ों का दबदबा हर जगह दिखता था।
धीरे-धीरे ये दबंग राजनीति में प्रवेश करने लगे।
कुछ विधायक बने, कुछ सांसद।
लोकतंत्र की बुनियाद — जनता की शक्ति — अब डर और प्रभाव की राजनीति में बदल चुकी थी।
नीतीश कुमार का दौर: ‘सुशासन’ की वापसी
2005 में जब नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली, तो उन्होंने सबसे पहले कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने पर जोर दिया।
राज्य में अपराधियों पर कार्रवाई शुरू हुई, सड़कें बनीं, स्कूल खुले और बिहार को एक नए दौर की उम्मीद मिली।
लोगों ने राहत की सांस ली कि ‘जंगलराज’ का अंत हो गया।
नीतीश कुमार ने प्रशासनिक सुधारों के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर फोकस किया।
उनके शासन को ‘सुशासन’ का प्रतीक कहा गया।
हालांकि, समय के साथ गठबंधन की राजनीति और सत्ता के समीकरणों ने फिर से पुराने दौर की झलक दिखानी शुरू कर दी।
अब ‘फुटानीबाज़ी’ गाँव की गलियों से निकलकर ठेकेदारी, पंचायत चुनावों और सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी थी।
लोकतंत्र की दिशा: जाति, डर और उम्मीदों के बीच
बिहार में लोकतंत्र का सफर कभी सीधा नहीं रहा।
यहां हर चुनाव में जाति समीकरण, बाहुबल और पैसे का प्रभाव दिखाई देता है।
मतदाता आज भी अक्सर अपने हितों की बजाय अपनी जातीय निष्ठा के आधार पर वोट डालते हैं।
लोकतंत्र का असली मतलब — "जनता की सरकार, जनता के लिए" — अब भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है।
लेकिन यह भी सच है कि आज का युवा पहले से ज्यादा जागरूक है।
वह सवाल पूछ रहा है, सरकार से जवाब मांग रहा है, और ‘फुटानी’ के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत दिखा रहा है।
नई पीढ़ी की सोच: बदलाव की किरण
बिहार की नई पीढ़ी अब गाँव से निकलकर शहरों और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुकी है।
वे जानते हैं कि राज्य की असली ताकत अब शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता में है — न कि किसी दबंग या नेता के संरक्षण में।
सोशल मीडिया के दौर में भ्रष्टाचार या अन्याय अब छिप नहीं सकता।
युवा जानते हैं कि “लोकतंत्र को बचाने का सबसे बड़ा हथियार वोट नहीं, जागरूकता है।”
निष्कर्ष: इतिहास से सबक लेने की ज़रूरत
आज़ादी से लेकर अब तक बिहार ने राजनीति के लगभग सभी रूप देखे — आदर्शवाद, समाजवाद, जातिवाद, अपराधवाद और अब गठबंधनवाद।
लेकिन हर दौर में जनता ही केंद्र में रही।
‘जंगलराज’ और ‘फुटानीबाज़ी’ की संस्कृति ने लोकतंत्र को कमजोर किया, पर बिहार ने बार-बार साबित किया है कि परिवर्तन संभव है।
जरूरत सिर्फ़ इस बात की है कि जनता फिर से वही साहस दिखाए जो उसने जेपी आंदोलन के वक्त दिखाया था।
अगर बिहार अपनी सोच बदले, जाति की दीवारें तोड़े और शिक्षा को हथियार बनाए,
तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया फिर कहेगी —
“बिहार, जहाँ से भारत बोलना सीखता है।”
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